अर्जुनारिष्ट का उल्लेख सुप्रसिद्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थ भैषज्य रत्नावली
के 'हृद्रोग चिकित्सा प्रकरण' में पार्थारिष्ट के नाम से मिलता है ।
इस ग्रन्थ के
अनुसार - हत्फुफ्फुस गदान् सर्वान् हन्त्ययं बलवीर्यकृत् - अर्थात् इसको
सेवन करने से हृदय और फुफ्फुस में उत्पन्न हुए समस्त विकार नष्ट होते है और
बलवीर्य की वृद्धि होती है । ग्रन्थकार ने इसे 'पार्थारिष्ट' कहा है और यह सभी
जानते हैं कि 'पार्थ' अर्जुन का ही पर्यायवाची शब्द है। इस योग के विषय में
चर्चा करने से पहले थोड़ा परिचय अर्जुन' वृक्ष के विषय में प्रस्तुत कर देना उचित
एवं उपयोगी होगा । भाव प्रकाश निघण्टु में लिखा है
ककुभ: शीतलो हृद्यःक्षतक्षयविषास्रजित्।
मेदोमेह व्रणान् हन्ति तुवरः कफपित्तहृत् ॥
भाषा भेद से नाम भेद - सं.- ककुभ । हि.- अर्जुन । म.- अर्जुन,
सालढोल । गु.- सादड़ो, आसोंदरो । बं.- अर्जुनगाछ । कन्न. - मद्दि । ते.-
तेलमद्दि । ता.- मरुदमरम हं.- अर्जुन (ArJun) लै.- टर्मिनेलिया अर्जुन
(Terminalia Arjun)
गुण - यह शीतल, हृदय को बल देने वाला व हितकारी, कसैला और
क्षत(घाव), क्षय, विष, रुधिर विकार, मेद (चर्बी), प्रमेह, व्रण, कफ और
पित्त को नष्ट करने वाला है। इसकी छाल कषाय रस युक्त और बल्य (बल देने
वाली) है तथा हृदय के रोगों को दूर करने के लिए सेवन योग्य है। यह हृदय
की धड़कन को ठीक और नियमित करने वाली श्रेष्ठ औषधि है।
परिचय - इसका वृक्ष बहुत बड़ा और लगभग ६० से ८० फिट ऊंचा
होता है। भारत में यह खास कर हिमालय की तराई, बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश
आदि प्रान्तों में कुदरती तौर पर पैदा होता है जबकि अन्य प्रान्तों में बोने पर
पैदा होता है। यह जंगली वृक्ष है और नदी-नालों के किनारे कतारबद्ध इसके
ऊंचे-ऊंचे वृक्ष देखे जा सकते हैं। इसके पत्ते अमरुद के पत्तों जैसे होते हैं और
डण्ठल के पास दो गांठें होती हैं । ग्रीष्म काल में इसमें फूल आते हैं और
शीतकाल में फल लगते हैं। इसके फूल हरापन लिये सफ़ेद होते हैं और मंजरी
तरह कंगूरेदार होते हैं।के रूप में लगे होते हैं। इसके फल गोल और कम गूदे वाले और कमरख की
उपयोग - विशेष रूप से अर्जुन की छाल उपयोगी होती है जो हृदय के लिए बहुत हितकारी होती हैं। इसके अलावा यह प्रमेह, रक्तविकार, रक्तपित्त, पित्तप्रकोप, क्षय और खांसी तथा घाव को ठीक करने में भी सफल सिद्ध होती है। चिकित्सकों और हृदय रोग विशेषज्ञों ने अपने परीक्षण एवं अनुसन्धान में, इसे हृदय के विकार और व्याधियों को दूर करने में बहुत गुणकारी पाया है। इस चूर्ण को सेवन करने से हृदय विकार एवं दौर्बल्य के रोगी को बहुत लाभ होता है । इसकी छाल को गुड़ के साथ दूध में उबाल कर एक कप दूध प्रतिदिन रात को सोते समय पीने से हृदय प्रदेश की सूजन ठीक होती है। पेशाब के साथ शुक्र गिरना (धातु स्राव) बन्द होता है। मुख्यतः तो यह योग
हार्ट पेशेन्ट यानी दिल के मरीज़ के लिए ही उपयोगी और अपने आप में बेजोड़ दवा है । स्त्री पुरुषों के लिए यह समान रूप से उपयोगी है। इसको मुख्य द्रव्य के रूप में लेकर कुछ और घटक द्रव्यों के साथ 'अर्जुनारिष्ट' नामक आयुर्वेदिक योग बनाया जाता है जो बाज़ार में आयुर्वेदिक औषधि विक्रेता के यहां आयुर्वेदिक निर्माताओं के द्वारा निर्मित बाटलपेक में मिलता हैं इसका फार्मूला इस प्रकार है -
अर्जुनारिष्ट
घटक द्रव्य-अर्जुन की छाल चार किलो, द्राक्षा (दाख या मुनक्का) २
किलो और महुए के फूल ८00 ग्राम, गुड़ ४ किलो, धाय के फूल ८०० ग्राम
और पानी ४००लिटर।
निर्माण विधि - ऊपर दिये गये घटक द्रव्यों की मात्रा, इसी अनुपात .
में, कम या ज्यादा की जा सकती है। अर्जुन वृक्ष की छाल, मुनक्का और महुआ
के फूल - तीनों को मोटा मोटा जौ कुट) कूट कर ४० लिटर पानी डाल कर
उबालें और काढ़ा करें। जब जल एकचौथाई अंश यानी १० लिटर शेष बचे तब
उतार कर छान लें। ठण्डा करके गुड़ और धाय के फूल डाल कर मिट्टी के
बर्तन में भर दें व ढक्कन लगा कर एक माह तक रखा रहने दें। एक माह बाद
इसे छान कर शीशियों में भर लें।
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मात्रा और सेवन विधि- इसे दोनों वक्त, सुबह शाम भोजन के बाद, २-२ चम्मच मात्रा में, आधा कप पानी में घोल कर पिएं।
लाभ- लगातार कुछ दिनों तक पीने से पित्त प्रकोप, हृदय रोग, हृदय
की निर्बलता, फेफड़ों की सूजन, हृदय का दर्द, धड़कन की शिथिलता आदि
व्याधियां नष्ट होती हैं । धड़के की बीमारी ठीक होती है और दिल मजबूत
होता है।
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मात्रा और सेवन विधि- सुबह शाम 15 ML आधे कप मात्रा में ठण्डे पानी के साथ लेना







